भूमिका, कार्य एवं रणनीति

  • फल, शाकभाजी तथा आलू की खेती में प्रति इकाई क्षेत्र के उत्पादन में वृद्धि।
  • अधिक मूल्यवान फलों (आम, अमरूद, केला, आंवला, लीची, नींबू प्रजाति आदि) तथा शाकभाजी (टमाटर, मटर, शिमला मिर्च, भिण्डी, गोभी कुल, लतावाली तथा अन्य प्रमुख सब्जियों) के उत्पादन पर समयबद्ध कार्यक्रमों द्वारा विशेष बल।
  • बागवानी विकास के लिए चल रहे विभिन्न योजनाबद्ध कार्यक्रमों को आपस में सहक्रियाशील रूप से सहयोगी बनाना।
  • निर्यात योग्य फलों, पुष्पों, मसाले तथा शाकभाजी का संहत क्षेत्रों में विकास। इस हेतु विशिष्ट फसलों के अन्तर्गत क्षेत्रों को चयनित कर उनके विकास की सुविधायें उपलब्ध कराना।
  • उन्नत, शुद्ध तथा रोगमुक्त फलदार पौधे, उन्नतशील एवं प्रमाणित शाकभाजी बीज, आधारीय एवं प्रमाणित आलू बीज के उत्पादन में वृद्धि तथा इसमें कृषकों एवं बागवानों को भागीदार बनाना।
  • प्रदेश में अनुसूचित जाति, जनजाति बाहुल्य खेत्रों में इस कोटि के कृषकों एवं लघु-सीमान्त कृषकों के खेतों में फल, शाकभाजी एवं पुष्प विकास को बढ़ावा देकर उनकी आय में वृद्धि कराना।
  • जल संचयन एवं गुणवत्ता युक्त उत्पादन की दृष्टि से ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति को अधिक ग्राह्य बनाना।
  • औद्यानिक फसलों की उत्पादकता में वृद्धि के लिए कृषकों तथा बागवानों को क्षेत्र स्तर पर नवीनतम विकसित तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराना।
  • फल एवं सब्जी का संरक्षण, मशरूम एवं पान उत्पादन, मौनपालन, कुकरी व बेकरी में प्रशिक्षण देकर कुटीर उद्योगों की स्थापना में वृद्धि कराना।
  • कृषि का अधिक आय देने वाली औद्यानिक फसलों में विविधीरकण कर आय एवं रोजगार में वृद्धि कराना।
  • पुराने, अल्पोत्पादक तथा अनुत्पादक बागों का जीर्णोद्धार कराना।
  • फसल तुड़ाई के उपरान्त हो रही क्षति को कम किये जाने हेतु तकनीकी हस्तांतरण का कार्य
  • संरक्षित खेती, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन तथा एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन प्रणाली के व्यापक रूप से ग्राह्यता बढ़ाने के कार्यक्रम नियोजित कराना ताकि पर्यावरण, मृदा एवं उत्पाद की गुणवत्ता में पर्याप्त सुधार हो सके।
  • औद्यानिक फसलों के विपणन हेतु सहकारिता के सिद्धान्त पर प्राथमिक औद्यानिक विपणन सहकारी समितियों का गठन कर उन्हें क्रियाशील बनाना।